जानिए कौन थी कुंभकरण की पत्नी और क्या था उसका नाम, जानें हरेक बात

यह तो सभी लोगों को पता होगा कि रावण के एक भाई का नाम कुंभकरण था। जिसे ब्रह्मा जी ने वरदान दिया था कि वह 6 महीने के लिए सोएगा और सिर्फ एक दिन के लिए भोजन करने के लिए जागेगा। रामायण में कुंभकरण का इस तरह से जिक्र किया गया है। वह भगवान श्रीराम से युद्ध नहीं करना चाहता था लेकिन अपने बड़े भाई रावण के हठी स्वभाव के कारण युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध में कुंभकरण ने भगवान राम की सेना को काफी क्षति पहुंंचाई। लेकिन अंत में उसे भगवान के हाथों वीरगति प्राप्त हुई। लोगों के कुंभकरण के बारे में इतना ही पता है। लेकिन कुंभकरण की एक पत्नी भी थी। जिसका उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है। तो आईए जानते हैं कि कौन थी कुंभकरण की पत्नी और क्या था उसका नाम-

बलि की पुत्री वज्र ज्वाला के साथ किया विवाह

लंकापति रावण ने अपनी शादी दानवों की पुत्री मंदोदरी से की थी। जबकि कुंभकरण ने अपना विवाह दैत्य राज बलि की पुत्री से किया था जिसका नाम वज्र ज्वाला था। दैत्य राज बलि वही था जिससे भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उससे तीन पग भूमि मांगी थी। जब भगवान विष्णु वामन अवतार में बलि से तीन पग रखने के लिए भूमि मांग रहे थे तब बाली की पुत्री वज्र ज्वाला वहीं पर मौजूद थीं। कई जगहों पर उल्लेख है वज्र ज्वाला काफी खूबसूरत थी।

कुंभकरण ने की थी तीन शादियां

कुंभकरण का सिर्फ एक विवाह नहीं हुआ था। पहला विवाह कुंभकरण ने वज्र ज्वाला के साथ किया। उसने अपना दूसरा विवाह कर्कटी नाम की कन्या के साथ किया था। वहीं कुंभरण का तीसरी शादी महोदर के राजा की बेटी के साथ हुआ था। महोदर की बेटी का नाम तडित्माला था।

कुंभकरण के पुत्रों का नाम

कुंभकरण ने तीन शादियांं की। इन तीन पत्नियों से कुंभकरण को चार पुत्र हुए। पहली पत्नी वज्र ज्वाला से कुंभकरण को दो पुत्र हुए जिनका नाम कुंभ और निकुंभ रखा गया था। वहीं अन्य दो पत्नियों के साथ कुंभकरण को दो और पुत्र हुए थे। जिनका नाम भीम और मूलकासुर था। एक लोक कथा के अनुसार माता सीता ने कुंभकरण के पुत्र मूलकासुर का वध किया था। वहीं भीम के नाम पर भीमांशकर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की गई थी।

कुंभकरण और वज्र ज्वाला शस्त्र बनाने में थे निपुण

कुंभकरण भले ही अधिक सोय रहता था लेकिन उस दिमाग काफी तेज था। वह लंका को सुरक्षित बनाने के लिए पत्नी वज्र ज्वाला के साथ कई दिव्य शस्त्र बनाता रहता है। कुंभकरण के साथ वज्र ज्वाला दिन रात उनकी सेवा करती रहती थी। यही कारण है कि जब कुंभकरण शस्त्र बनाता को उसे अपनी भूख का भी अहसास नहीं रहता था।

 

 

 

 

 

 

 

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