द्रोपदी की थाली का किस्सा, जुड़ी है बेहद रोचक पौराणिक कथा

महाभारत में कई किस्से कहानियां देखने को मिलती हैं। इन किस्से कहानियों में भाई बहन, भाई-भाई और दोस्त और गुरूओं की कहानियां देखने और सुनने को मिलती हैं। लेकिन हम आज उस कहानी के बारे में बताने जा रहें हैं जो बहुत कम लोगों को पता है। महाभारत की इस कहानी में हम द्रोपदी की उस कहानी के बारे में बताने जा रहे हैं जिससे उनके नाम की थाली प्रचलित हो गई। जी,हां हम बात कर रहें हैं द्रोपदी की थाली के बारे में, तो आईए जानते हैं महाभारत की इस लघु कथा के बारे में-

यह तब की बात है जब पांडव 13 साल के लिए वनवास काट रहे थे। तब हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र पुत्र में मोह में इतने लिप्त हो गए थे कि उन्हें कुछ नहीं समझ आ रहा था। पूरा राज्य दुर्योधन के इशारों पर ही चल रहा था। एक दिन ऋषि दुर्वासा हस्तिनापुर आ गए। ऋषि दुर्वासा को देख दुर्योधन ने उनकी काफी आवभगत की। दुर्योधन की यह आवभगत देखकर वह काफी प्रसन्न हो गए। ऋषि दुर्वासा ने फिर दुर्योधन को कहा कि मांगों क्या मांगना चाहते हो।

ऋषि दुर्वासा के इतना कहने पर दुर्योधन के मन में एक षडयंत्र रचने की सूझी। दुर्योधन ने ऋषि दुर्वासा से कहा अगर आप मेरे से इतना ही प्रसन्न हैं तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। आपके इतना कहने से ही मुझे पुण्य मिल गया है। मेरे पांडव भाईयों को भी यह पुण्य मिले, मेरी यही इच्छा है मुनिवर। आप मेरे पांडव भाईयों के साथ भी भोजन ग्रहण करके उन्हें अपनी सेवा करने का मौका दें। मेरी बस इतनी ही इच्छा है। ऋषि दुर्वासा दुर्योधन की इन बातों को सुन खुश हो उठे और तथास्तु कहा। ऋषि के जाने के बाद दुर्योधन बहुत खुश हो गया और मन ही मन ख्याली पुलाव पकाने शुरू कर दिए।

फिर जब एक दिन जब ऋषि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ पांडवों के पास पहुंचे। पांडवों ने उनका बड़े ही आदर सम्मान के स्वागत किया। ऋषि दुर्वासा ने पांडवों के साथ भोजन करने की इच्छा जताई। पांडवों के ज्येष्ठ युधिष्ठिर यह सुनकर खुश हो गए। उन्होंने दोपहर का भोजन साथ करने का अनुग्रह किया। युधिष्ठिर ने द्रोपदी को बताया कि ऋषि दुर्वासा आए हैं और वह हमारे साथ भोजन करेंगे। हम स्नान करके आ रहे हैं तब तक आप भोजन तैयार करके रखें। इतना कहते ही युधिष्ठिर स्नान के लिए चल दिए और द्रोपदी अपनी बात नहीं कह पाई।

लेकिन द्रोपदी के सामने सबसे बड़ी समस्या यह आ गई कि अनाज का एक कण भी उनके पास नहीं था। अगर वह ऋषि दुर्वासा को भोजन नहीं करवा पाएंगी तो वह उन्हें और पांडवों को श्राप दे देंगे। इससे वह काफी डर गई। अब इस मुश्किल घड़ी में द्रोपदी की सिर्फ कृष्ण ही मदद कर सकते थे। इसलिए द्रोपदी ने उन्हें मन में पुकारा। अपनी सखा को मुश्किल में देख कृष्ण भी द्रोपदी की मदद करने के लिए आ गए। कृष्ण पूरे वाक्य से परिचित थे। इसलिए उन्होंने द्रोपदी की मदद करने की ठानी।

कृष्ण ने द्रोपदी से कहा वह उनके लिए भोजन के लिए कुछ ले आए। द्रोपदी ने अपने सखा कृष्ण को बताया कि इस समय अनाज का एक दाना भी घर में नहीं है। फिर कृष्ण ने कहा कि जो भी पड़ा है वह ले आओ मैं खा लूंगा। द्रोपदी ने फिर ढूंढना शुरू किया कि उन्हें कुछ मिल जाए। ताकि वह कृष्ण को खाने के लिए दे सकें।

जब द्रोपदी ने ढूंढना शुरू किया तो उन्हें साग को छोटा सा टुकड़ा दिखाई दिया। द्रोपदी ने सोचा कि यही कृष्ण को बनाकर खिला देती हूं। द्रोपदी ने कृष्ण को भोजन करने के लिए वह साग का छोटा सा टुकड़ा दे दिया। कृष्ण वह खाकर ही तृप्त हो गए। उन्होंने द्रोपदी से कहा कि मेरा पेट भर गया है अब मैं और कुछ नहीं खा पाउंगा। स्नान करने के बाद लौट रहे ऋषि दुर्वासा और उनके शिष्यों की भूख खत्म हो गई। उन सभी का पेट भर गया था।

अब ऋषि दुर्वासा ने सोचा कि अगर वह द्रोपदी के पास जाएंगे और अन्न ग्रहण नहीं करेंगे तो इससे पांडवों और द्रोपदी का अपमान होगा। इसलिए ऋषि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ यात्रा पर निकल पड़े। वहीं पांडवों का भी पेट भर गया था। इसलिए उन्होंने द्रोपदी से भोजन की मांग नहीं की। द्रोपदी सब जान गई थी कि यह सब उनके सखा कृष्ण ने किया है।

इसलिए जब कोई मेहमान भोजन से प्रसन्न होता है तो कहा जाता है कि द्रोपदी की थाली। द्रोपदी की थाली को लेकर कई और कहानियां भी हैं जिसमें उन्होंने थोड़े से भोजन से सभी का पेट भरा। तभी से यह भी कहा जाता है कि द्रोपदी की थाली कभी खत्म नहीं होती।

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