जानें क्यों भगवान शिव और हनुमान जी में युद्ध हुआ, कौन रहा इस युद्ध में विजयी, पढ़े पूरी कहानी

भगवान हनुमान जी श्रीराम जी के कितने बड़े भक्त हैं यह तो हर कोई जानता है। हनुमान जी श्रीराम जी के लिए कोई भी कार्य करने को लेकर आतुर रहते थे। वह हमेशा भगवान की सेवा करना चाहते थे। यही कारण है कि भगवान श्रीराम के ऊपर आने वाली हर विकट परिस्थितियों को हनुमान जी टालने की समर्थता रखते थे। भगवान श्रीराम के कारण ही हनुमान जी भगवान शिव से भी युद्ध करने के लिए तैयार हो गए। बावजूद इसके ज्ञात होने के भगवान शिव ने ही इस संसार की रचना की है वह उनसे युद्ध किया और इस युद्ध का क्या कारण था आखिर इस युद्ध में कौन विजयी रहा। हम आपको इस कथा के बारे में बताने जा रहे हैं।

 

भगवान श्रीराम जब लंका में रावण को हराकर अयोध्या वापिस आए तो उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाया। इस यज्ञ में एक अश्व को छोड़ दिया जाता है और जिन राज्यों की सीमाओं से वह गुजरता है अगर उस राज्य के राजा ने अश्व को जाने दिया तो वह उनके अधीन राज्य करने के लिए मान जाता है। लेकिन अगर कोई राजा अश्व को रोक लेता है तो फिर युद्ध होता था।

यह तो आप सभी जानते होंगे कि भगवान श्रीराम जी के अश्वमेध यज्ञ को उनके ही पुत्रों लव और कुश ने रोक लिया था और भगवान श्रीराम जी की सेना को युद्ध की चुनौती दी थी। लव कुश ने भगवान श्रीराम के भाईयों को युद्ध में परास्त कर दिया। इसके बाद भगवान श्रीराम जी ने हनुमान को युद्ध के लिए भेजा। भगवान हनुमान जी ने लव और कुश को पहचान लिया और उनके बंदी बन गए। अंत में भगवान श्रीराम को ही अपने पुत्रों लव कुश से युद्ध करना पड़ा।

लेकिन सिर्फ लव और कुश ने ही नहीं बल्कि भगवान श्रीराम जी के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को देवपुर के राजा वीरमणि के बेटे रुक्मांगद ने भी रोका था। वीरमणि भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। इस वजह से अयोध्या और देवपुर की सेना के बीच युद्ध शुरू हो गया। वीरमणि ने भगवान श्रीराम की सेना से युद्ध करने के लिए अपने सबसे शक्तिशाली योद्धाओं को भेजा। वहीं भगवान श्रीराम की सेना की ओर से हनुमान जी थे जो खुद शिव के अंश थे।

भगवान हनुमान ने इस युद्ध में देवपुर के सभी शक्तिशाली योद्धाओं को परास्त कर दिया। इस युद्ध में हनुमान जी ने वीरमणि को भी मुर्च्छित कर दिया। भगवान शिव ने वीरमणि को वरदान दिया था कि जब भी वह संकट में होंगे तो वह उनकी सहायता के लिए अवश्य आएंगे। भगवान शिव इस युद्ध में वीरमणि की सेना के लिए युद्ध करने के लिए आए। उन्होंने भगवान श्रीराम जी की सेना में त्राहि- त्राहि मचा दी। फिर अपने प्रभु श्रीराम की सेना को हनुमान जी परास्त होते कैसे देख सकते थे।

हनुमान जी इतने क्रोधित हो उठे कि वह भूल गए कि वह जिनसे युद्ध करन जा रहे हैं वह कोई और नहीं बल्कि भगवान शिव थे। भगवान शिव और हनुमान जी में काफी भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में ना तो भगवान शिव पीछे हट सकते थे और ना ही हनुमान जी। हनुमान जी को खुद भगवान शिव ने आर्शीवाद दिया हुआ और सभी देवताओं का भी आर्शीवाद मिला हुआ था। इस वजह से भगवान शिव हनुमान पर जो भी वार करते हनुमान जी परास्त कर देते। इसके बाद दोनों ही भगवानों के बीच दिव्य अस्त्रों से युद्ध होने लगा। युद्ध भयंकर होता जा रहा था।

जब भगवान श्रीराम जी को इस बारे में पता चला तो वह तुरंत उस स्थान पर पहुंचे। भगवान श्रीराम ने हनुमान जी को बड़े ही प्यार से समझाया कि हे हनुमंत! तुम किससे युद्ध कर रहे। सृष्टि के रचयिता शिव से। हनुमान शिव ही राम हैं और राम ही शिव हैं। प्रभु श्रीराम के यह शब्द सुनकर हनुमान जी को भगवान शिव में श्रीराम की छवि दिखने लगी। यह देखकर हनुमान जी का गुस्सा शांत हो गया और उन्होंने भगवान शिव के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। जिससे इस युद्ध का अंत हुआ।

लेकिन भगवान शिव हनुमान जी से क्रोधित नहीं हुए बल्कि उनके इस पराक्रम को देखकर वह काफी प्रसन्न हो गए। भगवान शिव ने हनुमान जी को मनचाहा वर मांगने को कहा। दरअसल यह भगवान श्रीराम और शिव की ही लीला थी। दोनों ही हनुमान जी की परीक्षा ले रहे थे और हनुमान जी उस परीक्षा में सफल हुए।

 

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