जानिए क्यों गिलहरी पर होती हैं धारियां, भगवान श्रीराम से जुड़ी है रोचक कथा

गिलहरी के शरीर के ऊपर धारियां होती हैं यह तो सभी जानते हैं। लेकिन यह धारियां क्यों होती है यह बहुत कम लोग ही जानते हैं। तो हम आज आपको अपने इस लेख में गिलहरी के ऊपर धारियां कैसे आई और गिलहरियों को क्यों भगवान राम की गिलहरी कहा जाता है उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

गिलहरी के शरीर पर धारियों को लेकर जो पहली कथा प्रचलित है वह यह है कि जब भगवान श्रीराम पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास में जा रहे थे। ना ही भगवान श्रीराम ने और ना ही माता सीता और लक्ष्मण ने पांव में खड़ाउ पहना था। वह बिना खड़ाउ पहने ही वनवास में चल रहे थे। तो इस दौरान कई जगह पर सतह नर्म होती तो कई जगहों पर कठोर। वनवास में कुछ ऐसे स्थान भी होते जहां कांटे काफी होते थे। एक दिन वनवास में भगवान श्रीराम के पैरों के नीचे एक गिलहरी आ गई। भगवान श्रीराम को जब इसके बारे में पता चला तो उन्हें बहुत दुख हुआ कि एक छोटे से जीव पर उनका पांव पड़ गया। उन्होंने फिर उस गिलहरी को अपने हाथों से उठाया और बड़े ही विनम्रता से कहा कि- मेरा पांव तुम्हारे ऊपर पड़ गया। तुम्हें मेरे कारणवश पीड़ा सहन करनी पड़ी। तुम्हें बहुत दर्द हुआ होगा ना?

भगवान श्रीराम के पूछने पर गिलहरी ने कहा- हे प्रभु! आपके चरणों के दर्शन मिलना बहुत दुर्लभ होते हैं। देवता और संत आत्माएं जिनकी सेवा और पूजा करते हुए थकते नहीं है। उनके चरण मेरे ऊपर पड़े, मेरे लिए यह बहुत बड़े सौभाग्य की बात है कि मुझे आपके चरणों में सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ। मुझे गर्व हो रहा है कि मैं आपके पांव को इन कठोर राहों से क्षण भर के लिए आराम देने में काम आ सकी।

प्रभु श्रीराम गिलहरी की इन बातों को बड़े ही ध्यान से सुन रहे थे। गिलहरी के कहने के बाद भगवान श्रीराम ने पूछा- लेकिन जब मैंने मेरा पांव आपके शरीर पर पड़ा तो आपको पीड़ा तो आवश्य जरूर हुई होगी ना? तुम अपनी पीड़ा को लेकर कराहा नहीं, ऐसा क्यों? इस पर गिलहरी ने कहा कि हे प्रभु! जब मुझ पर कोई पांव रखता है तो मैं आवश्य कराहती, तो मैं कराहते हुए आपका नाम स्मरण करती और हे राम! हे राम! हे राम! कहती। लेकिन जब आपने ही मुझ पर अपना पांव रख दिया तो मैं किसे पुकारती प्रभु?

फिर इसके बाद प्रभु श्रीराम ने गिलहरी के ऊपर बड़े ही प्यार से अपना उंगलिया फेरीं ताकि गिलहरी को जो पीड़ा हुई है उससे राहत मिल सके। जब भगवान श्रीराम ने गिलहरी पर उंगलियां फेरने चाहीं तो उनकी तीन उंगलियां ही गिलहरी पर आ सकी। भगवान श्रीराम की वह तीन उंगलियां गिलहरी के ऊपर निशान के रूप में पड़ गई। तब से ही गिलहरियों पर निशान होते हैं और उन्हें राम जी की गिलहरियां भी कहा जाता है।

वहीं इसे लेकर एक दूसरी कथा भी है जो लोगों में काफी प्रचलित है। इस कथा के अनुसार जब लंका जाने के लिए भगवान श्रीराम की सेना रामसेतु का निर्माण कर रही थी। तब वहां पर मौजूद नन्हीं गिलहरियों ने इस सेतु को बनाने में भी अपना योगदान दिया था। नन्ही गिलहरियां सेतु के निर्माण के लिए अपने मुंह से कंकड़ को उठाकर फेंक रहीं थी। लेकिन इस दौरान गिलहरियों को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी क्योंकि वार्नर सेना बड़े-बड़े पत्थर फेंक रही थी। पर वार्नर सेना नहीं चाहती थी कि नन्ही गिलहरियां उनके पांव के नीचे आएं और जख्मी हो जाए। इसलिए वह उन पर क्रोधित हो उठे और कहा कि तुम हमारे कार्य में बाधा बन रही हो।

तभी वहां पर मौजूद एक वार्नर ने नन्हीं गिलहरियों का उपहास किया। प्रभु श्रीराम दूर से बैठे इस दृश्य को देख रहे थे। भगवान श्रीराम अपने स्थान से उठे और वार्नर सेना के पास गए। उन्होंने वार्नर सैनिकों से कहा कि आप इन नन्ही गिलहरियों को लज्जित क्यों कर रहे हैं। इन नन्हीं गिलहरियों के छोटे पत्थरों से बड़े पत्थरों के बीच में जो फासले हैं वह भर जाएंगे जिससे सेतु को मजबूती मिलेगी। यह सुनकर वार्नर सेना ने शर्म के मारे अपना सिर झुका लिया और उन्होंने नन्हीं गिलहरियों से माफी मांगी।

इसके बाद भगवान श्रीराम ने उन गिलहरियों को अपने हाथ पर उठाया और उनके इस कार्य की सराहना की। भगवान सराहना करते हुए गिलहरियों के शरीर पर प्यार से अपना हाथ फेरा। जिससे उन गिलहरियों की पीठ पर भगवान श्रीराम की उंगलियों के निशान पड़ गए और तीन रेखाएं बन गईं। आज भी गिलहरियों के ऊपर यह तीन निशान हैं। इन तीन रेखाओं को भगवान श्रीराम, सीता माता और लक्ष्मण का प्रतीक भी माना जाता है।

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