जानें रक्षा बंधन के पीछे की पौराणिक कथा, माता लक्ष्मी जी से है संबंध

रक्षा बंधन का त्योहार भाई बहन के प्रेम। को दर्शाने का सबसे अच्छा त्योहार है। भाई बहन एक-दूसरे को प्यार करते हैं और उसे दर्शाते हैं कि यह दिन उनके लिए खास होता है। यह त्योहार भारत में कई सदियों से मनाया जा रहा है। लेकिन इस त्योहार की शुरूआत कब हुई इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। तो आईए जानते हैं कि रक्षा बंधन के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा है और माता लक्ष्मी का इस त्योहार से क्या नाता रहा है।

पौराणिक कथा के अनुसार जब एक बार देवताओं के राजा इंद्र वृत्तासुर नामक राक्षस से युद्ध करने जा रहे थे। युद्ध करने से पहले इंद्र की पत्नी शची ने इंद्र के हाथ में एक सूत्र बांधा ताकि उनकी युद्ध में रक्षा हो सके। तभी से रक्षा बंधन का त्योहार अस्तित्व में आया। लेकिन भाई-बहन का यह त्योहार तब माना गया जब माता लक्ष्मी का संबंध इस त्योहार से जुड़ा।

श्रमद्भगवत पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु ने दैत्याओं के राजा बली से तीन पग भूमि मांगने के लिए वामन रूप धारण किया। वामन का अवतार धारण कर भगवान विष्णु ने राजा बली से उनसे तीन पग भूमि देने का वचन मांगा। राजा बली ने भगवान के इस वचन को पूरा भी कर दिया। लेकिन अपना वचन पूरा करने के बाद राजा बली ने भी वामन से एक वचन ले लिया।

राजा बली ने वामन रूप धारण कर आए विष्णु भगवान से यह वचन मांगा की वह सदैव उनकी सेवा करेंगे। लेकिन भगवान विष्णु ने राजा बली को वचन तो दे दिया। पर वह भूल गए कि उन्हें माता लक्ष्मी के पास दोबारा जाना है। वचन देने के बाद भगवान पीछे भी नहीं हट सकते थे। इससे माता लक्ष्मी काफी चिंतित हो गई।

माता लक्ष्मी को चिंतित देख नारद जी उनके पास पहुंच गए। नारदजी ने माता लक्ष्मी से उनके चिंतित होने के कारण पूछा तो उन्होंने नारद जी को सब बताया। फिर नारद जी ने माता लक्ष्मी जी को एक उपाय बताया कि जिससे वह अपने प्रभु विष्णु भगवान को अपने पास दोबारा बुला सकती हैं।

नारद जी ने माता लक्ष्मी जी से कहा कि आप राजा बली को अपना भाई बना लें और अपनी रक्षा करने का वचन मांग लें। माता लक्ष्मी जी ने नारद के इस उपाय को मान लिया और एक साधारण महिला बनकर राजा बली के पास पहुंच गई। वहां पर जाकर उन्होंने विलाप करना शुरू कर दिया।

राजा बली ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने मेरा कोई भी भाई नहीं है और ना ही मुझे कोई बहन के रूप में स्वीकार कर रहा है। आप ही बताएं मैं क्या करूं महाराज। तब राजा बली ने साधरण कन्या को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया। इसके साथ ही उन्होंने राजा बली के हाथ में एक सूत्र भी बांधा और यह वचन लिया कि वह उनकी सदैव रक्षा करेंगे।

राजा बली ने भी वचन दिया कि वह उनकी सदैव रक्षा करेंगे। जैसे ही राजा बली ने बली ने वचन दिया माता लक्ष्मी जी अपने असली रूप में आ गई। उन्होंने राजा बली से कहा कि अब आपने मुझे अपनी बहन स्वीकार कर लिया है और मेरी रक्षा करने का भी वचन दे चुके हैं। इसलिए मैं चाहती हूं कि आपकी सेवा में जो वामन अवतार में मेरे पति हैं उन्हें मुक्त कर दें। राजा बली ने माता लक्ष्मी जिन्हें उन्होंने अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया हुआ था। उन्हें दिया हुआ वचन पूरा किया और भगवान विष्णु को अपनी सेवा से मुक्त कर दिया।

कहा जाता है जिस दिन यह पूरी घटना घटी थी उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। तभी से यह त्योहार भाई बहन के प्रतीक में मनाया जाने लगा। जहां बहन अपने भाई की कलाई पर धागे का एक सूत्र बांधते हैं और भाई उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। यही कारण है कि रक्षा बंधन के त्योहार पर राजा बली की कथा भी सुनी जाती है।

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