भगवान श्रीराम ने क्यों और कहां जल समाधि ली, इसके पीछे क्या थी वजह, जानें चौंका देने वाले रहस्य

भगवान श्रीराम सभी लोगों के अराध्य हैं। भगवान श्रीराम ने बताया कि जीवन में राजा को कैसा होना चाहिए। एक राजा के लिए उसकी प्रजा का ही सुख सब कुछ होता है। दुनिया को राजपाठ सिखाने के बाद भगवान श्रीराम ने पृथ्वी लोक छोड़ने का फैसला किया। लेकिन भगवान श्रीराम ने पृथ्वी लोक को कैसे छोड़ा इसके पीछे है एक बेहद ही रोचक कथा है जिसे आपको जरूर जानना चाहिए।

रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम ने कई सालों तक राजपाठ संभाला। अयोध्या को संभालते हुए भगवान को कई साल बीत गए। तभी एक दिन ब्रह्म देव और गुरू वशिष्ठ ने भगवान श्रीराम को पृथ्वी लोक छोड़ने का आदेश दिया। भगवान श्रीराम ने उनके आदेश को माना और पृथ्वी लोक छोड़ने का निर्णय किया और अब उनके सामने सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि वह कैसे इस लोक को छोड़ें। क्योंकि लक्ष्मण जो खुद शेष नाग के अवतार थे वह भगवान को जाने नहीं देंगे।

यमराज भी यह जान चुके थे कि भगवान श्रीराम को लक्ष्मण कुछ भी नहीं होने देंगे। इसलिए उन्होंने एक चाल चली। एक दिन यमराज भेष बदलकर भगवान श्रीराम से मिलने आ गए। भगवान श्रीराम ने यमराज जी को पहचान लिया और उनसे अयोध्या में आने का कारण पूछा। यमराज ने भगवान श्रीराम से कहा कि मुझे आपसे कोई आवश्यक बात करनी है वह भी एकांत में जहां कोई आता ना हो। इसलिए भगवान उन्हें अपने कक्ष में ले गए।

यमराज ने भगवान श्रीराम से कहा कि मैं चाहता हूं कि आपकी और मेरी बात कोई भी बीच में ना आए और अगर कोई आ गया तो उसे मृत्युदंड देंगे। भगवान इसके लिए मान गए और अपने कक्ष के बाहर खड़ा कर दिया। क्योंकि उन्हें पता था कि लक्ष्मण सदैव उनकी आज्ञा का पालन करेंगे। भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को कहा कि जब तक वह ना कहें किसी को भी अंदर ना आने दें।

लक्ष्मण भगवान श्रीराम के कक्ष के बाहर पहरा देने लगे। इतने में उसी समय ऋषि दुर्वासा अयोध्या आ पहुंचे। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि वह भगवान श्रीराम से मिलना चाहते हैं और जाकर मेरा यह संदेश पहुंचाए। लेकिन लक्ष्मण ने भगवान श्रीराम की आज्ञा का पालन करते हुए ऋषि दुर्वासा को यह कहा कि बड़े भईया ने कहा कि जब तक वह ना कहें तब तक कोई कक्ष में ना आए। इसलिए हे ऋषि आपसे विनती कर रहा हूं कि आप तनिक प्रतिक्षा कर लें।

ऋषि दुर्वासा लक्ष्मण की इन बातों को सहन नहीं कर पाए और क्रोधित हो गए। उन्होंने गुस्से में आकर कहा कि शीघ्र ही जाओ और राम से कहो कि मैं उनसे मिलना चाहता हूं अन्यथा मैं पूरी अयोध्या को श्राप दे दूंगा। ऋषि दुर्वासा के इस क्रोध से लक्ष्मण डर गए और सोच में पड़ गए कि उन्हें आयोध्या को बचाने के लिए अपने प्राण त्याग करने होंगे। इसलिए उन्होंने भगवान श्रीराम की आज्ञा की अवेहलना करने का फैसला किया।

लक्ष्मण भगवान श्रीराम के कक्ष में प्रवेश कर गए। लक्ष्मण को देखकर भेष बदलकर आए यमराज वहां से तुरंत गायब हो गए। भगवान श्रीराम लक्ष्मण को देखकर क्रोधित हो उठे और कहा कि लक्ष्मण मैंने तुम्हें कहा था कि इस कक्ष में मत आना और आने वाले को मृत्युदंड दिया जाए। लेकिन इसके उपरान्त भी तुम मेरे कक्ष में आ गए। तुमने मेरे कक्ष में आने का यह दुस्साहस क्यों किया।

लक्ष्मण ने बड़ी ही विनम्रता से कहा कि भईया ऋषि दुर्वासा आपसे मिलना चाहते हैं। मैंने उन्हें कहा कि आप कक्ष में किसी से बात कर रहें हैं लेकिन वह अपनी हठ लेकर बैठे हुए थे। उन्होंने कहा कि अगर मैं उनका संदेश आप तक नही पहुंचाता वह पूरी अयोध्या नगरी को श्राप देंगे जिस कारणवश मैंने यह दुस्साहस किया। लेकिन लक्ष्मण के ऐसा करने पर अब उन्हें अपने अनुज को मृत्युदंड देना पड़ेगा।

इसे लेकर जब भगवान श्रीराम ने गुरू वशिष्ठ से विचार विमर्श किया तो उन्होंने एक उपाय बताया कि आप लक्ष्मण को अपने से दूर कर दीजिए क्योंकि अपनों से दूर जाना भी मृत्यु के समान होता है। लेकिन लक्ष्मण ने यह करने से मना कर दिया कि वह अपने प्रिय भाई श्रीराम से दूर नहीं जाएंगे। इसलिए उन्होंने भगवान श्रीराम के वचन की लाज रखते हुए सरयू नदी में जकर जल समाधि ले ली। इसलिए कहा जाता है कि रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाए।

लक्ष्मण के जल समाधि के बाद भगवान श्रीराम के लिए यह पृथ्वी लोक छोड़ना आसान हो गया। भगवान श्रीराम ने सरयू नदी में अश्विन पूर्णिमा के दिन भरत को अयोध्या का राजपाठ सौंपकर खुद अयोध्या की सरयू नदी में जल समाधि ले ली। भगवान श्रीराम के जब जलसमाधि ले रहे थे तब उनके पीछे उनका पूरा परिवार था। भगवान श्रीराम ने ॐ का उच्चारण करते हुए अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली और पृथ्वी लोक को छोड़ दिया।

 

 

 

 

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